Sunday, 25 May 2014

हादसा... *******


हमारा मिलना 
हर बार एक हादसे में तब्दील हो जाता है 
हादसा
जिससे दूसरों का कुछ नहीं बिगड़ता 
सिर्फ हमारा-तुम्हारा बिगड़ता है  
क्योंकि 
ये हादसे हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा हैं 
हमारे वजूद में शामिल 
दहकते शोलों की तरह 
जिनके जलने पर ही ज़िन्दगी चलती है  
अगर बुझ गए तो 
जीने का मज़ा चला जाएगा 
और बेमज़ा जीना तुम्हें भी तो पसंद नहीं 
फिर भी 
अब 
तुम्हें साथी कहने का मन नहीं होता  
क्योंकि 
इन हादसों में कई सारे वे क्षण भी आए थे 
जब अपने-अपने शब्द-वाण से
हम एक दूसरे की ह्त्या तक करने को आतुर थे 
अपनी ज़हरीली जिह्वा से  
एक दूसरे का दिल चीर देते थे  
हमारे दरम्यान कई क्षण ऐसे भी आए थे  
जब खुद को मिटा देने का मन किया था 
क्योंकि कई बार हमारा मिलना 
गहरे ज़ख़्म दे जाता था 
जिसका भरना कभी मुमकिन नहीं हुआ  
हम दुश्मन भी नहीं 
क्योंकि कई बार अपनी साँसों से 
एक दूसरे की ज़िन्दगी को बचाया है हमने 
अब हमारा अपनापा भी ख़त्म है 
क्योंकि मुझे इस बात से इंकार है कि 
हम प्रेम में है 
और तुम्हारा जबरन इसरार कि 
मैं मान लूँ     
''हम प्रेम में हैं और प्रेम में तो यह सब हो ही जाता है'' 
सच है 
हादसों के बिना  
हमारा मिलना मुमकिन नहीं
कुछ और हादसों की हिम्मत 
अब मुझमें नहीं 
अंततः 
पुख्ता फैसला चुपचाप किया है - 
''असंबद्धता ही मुनासिब है''   
अब न कोई जिरह होगी 
न कोई हादसा होगा !

Saturday, 3 May 2014

चालाकी जिंदाबाद


हिंदुस्तान चालाक लोगों का देश है। यहां लोग का मतलब जनता नहीं है। क्योंकि इस देश की जनता चालाक नहीं है। चालाक वे हैं जिनका इस देश पर कब्जा है। कब्जा कई तरह का है। इस देश की सत्ता पर नेताओं का कब्जा है। धन पर व्यापारियों का कब्जा है। कानून पर गुंडों का कब्जा है। देश उसीका होता है जिसका कब्जा होता है।
तो, सबसे पहले तो यह देश चालाक नेताओं का देश है। वे देश की समस्याएं हल करने का दावा तो करते हैं पर करते नहीं। बस उनसे अपनी गरदन बचा लेते हैं। चूंकि नेता अपनी गरदन बचाना जानते हैं, इसलिए गरदन किसी और की कटती है। चालाक नेता अपनी सफलता से बड़ा खुश होकर सोचता है कि गरदन कटी तो किसी और की कटी, अपनी तो बच गयी। लेकिन जो समस्या हल नहीं होती वह किसीकी गरदन नहीं छोड़ती, नेता की भी नहीं। तो क्या इस देश की समस्याएं हल हो ही नहीं सकती? जी नहीं, हर समस्या हल हो सकती है, बशर्ते कि ईमानदारी से की जाए। और, यही सबसे बड़ी मुश्किल है। क्योंकि यह तो चालाक लोगों का देश है। चालाकी और ईमानदारी अकसर एक साथ नहीं चलतीं।
यह देश चालाक व्यापारियों का देश है। पैसे के बदले में सेवा देना बेवकूफी है। सही तोलना, सही नापना, मिलावट न करना बेवकूफी है। हिंदुस्तान के व्यापारियों ने बेवकूफी करना नहीं सीखा। लेकिन चालाक लोग यह भूल जाते हैं कि बेईमानी एक वायरस है, एड्स से भी ज्यादा यानक। एड्स से केवल शरीर सड़ता है। बेईमानी पूरे समाज को सड़ा देती है। सड़े हुए समाज में कोई सुरक्षित नहीं रहता। व्यापारी तो बिलकुल नहीं।
गुंडे हर देश में होते हैं। लेकिन हमारे देश में तो वे महान हो गये हैं। वे एक हाथ से गुंडागिरी करते हैं और दूसरे से समाज सेवा। एक हाथ से गला काटते हैं और दूसरे से सिर सहलाते हैं। अब तो गुंडे नेता भी बन गये हैं। सोचने की बात यह है कि जो आज एमपी बन गया है, कल वह पीएम भी बन सकता है। जी हां, ऐसा बिलकुल हो सकता है। क्योंकि अगर देश अपने गुंडों को सजा नहीं दे सकता, तो यह तय मानिए कि एक दिन वह गुंडों को सत्ता भी सौंप देगा। जो कानून गुंडे की गरदन नहीं पकड़ता वह गुंडों के पांवों में पड़ा रहता है। जब देश पर गुंडे राज करेंगे तब कानून उनका हुक्म बजायेगा। देश में टैक्स कोई दे या न दे, हफ्ता सब देंगे।
गुंडे बेधड़क आपकी जेब काटेंगे और जेब में कुछ न निकलने पर भरे बाजार में आपकी बेइज्जती करेंगे। चोर मांग करेंगे कि घरों में ताला लगाने के खिलाफ कानून बनाया जाए। लूट को उद्योग का दर्जा दिया जाए। जो लुटने की शिकायत करने पुलिस में जाएगा, पुलिस वाले उसे इन्कम टैक्स वालों के हवाले कर देंगे− बता, तेरे पास इतना पैसा आया कहां से कि कोई तुझे लूटने आ गया?
चालाक लोग ती सफल होते हैं जब आम लोग मूर्ख बनने को तैयार हों। और, इस देश में जनता से बड़ा मूर्ख कोई नहीं है। उसने मान लिया है कि धोखा खाना, बेवकूफ बनना, लुटना उसकी मजबूरी है। लोग पिछले पचास साल से बेवकूफ बनते आये हैं, पर कुछ किया नहीं। अगले पचास साल भी बेवकूफ बनते रहेंगे और कुछ नहीं करेंगे। हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहेंगे। अपनी जाति, अपनी जमात, अपने धर्म की खातिर मरने को तैयार रहेंगे, पर बेईमानी से लड़ने कोई आगे नहीं आएगा। जो समाज अपने अंदर के बेईमानों से नहीं लड़ता, वह दूसरों के बेईमानों को भी नहीं हरा सकता।
हिंदुस्तान एक विचित्र देश है। आये दिन यहां लोग बेईमानी का विरोध करते नजर आते हैं। लेकिन परेशानी यह है कि़ जो बेईमानी का विरोध करता है वह खुद भी तो ईमानदार नहीं होता। जी हां, हिंदुस्तान एक विचित्र देश है। यहां आजाद सब हो गये, जिम्मेदार कोई नहीं हुआ।

Sunday, 20 April 2014

...........पता नहीं !

...........पता नहीं !




अब तो केवल यादें हैं
उनके सिवा कुछ भी नहीं
वक़्त ने मुझको गुज़ारा
या मैंने वक़्त को -पता नहीं !

धुंधली सी परछाइयाँ
आ घेर लेतीं मुझको जब
धुंधली होतीं शामें तकता
सोचता क्या- पता नहीं !

कौनसी थी वह ख़ता
अनजाने में मुझसे हो गयी
छोड़कर सब चल दिए
क्यूँ जी रहा मैं  -पता नहीं !

वादा खिलाफी मैंने की
यह मान मैं सकता नहीं
कोशिशों में रह गयी
शायद कमी -पता नहीं !

अब तो अकेले रहने की
आदत है मुझको पड़ गयी
रौशनी कब मेरी थी
कब मेरी होगी -पता नहीं

दर्द और रिश्ता

प्रतिदिन दर्द और रिश्ताके अनुभवसे हम गुजरते हैं लेकिन दर्द इए रिश्ता को समझनें की कोशिश हम नहीं करते । की समाधिमें पहुँच कर प्रभु ही बन जाता है । रिश्ते में जो दर्द उठता है वह दो प्रकारका होताहै ; एक वह दर्द जो जुदाईके कारण उठता है और दूसरा दर्द कृतिम दर्द होता है जो बुद्धि - अहंकारके सहयोगसे उठता है । जुदाई का दर्द प्राकृतिक दर्द होता है जिसके तार हृदय से जुड़े होते हैं लेकिन कृतिम दर्द बुद्धि एवं अहंकार की उपज है ।प्राकृतिक दर्द हृदय का दर्द है और कृतिम दर्द अहंकारकी उपज है । अहंकारका दर्द नर्क में पहुंचता है और प्राकृतिक दर्दमें परमकी खुशबू मिलती रहती है ।
दर्दमें रिश्ते और रिश्तेमें दर्द दोनों का अनुभव एक दुसरे से थीक उल्टा होता है , दर्द में रिश्तेकी तलाशमें मन होता है और रिश्ते में दर्दका अनुभव वैराग्य की ओर चलता है । दर्दसे रिश्ता है ? या रिश्तेसे दर्द है ? बहुत कठिन है इस समीकरणको समझना । दर्दमें जो रिश्ता बनता है वह परम रिश्ता होता है जैसे माँ और औलादका रिश्ता जो प्रसव पीड़ासे सम्बंधित रिश्ता है लेकिन अब यह रिश्ता भी कमजोर होता दिख रहा है क्योंकि अब शिशुका जन्म बिना प्रसव पीड़ा संभव  है । भक्त और भगवानके मध्य दर्दका रिश्ता है जहां भक्त रोता - रोता नाचनें भी लगता है जैसे मीरा और परमहंस श्री परमहंस जी । भक्तिमें उठी दर्द जब भक्तके हृदयको पिघलाती है तब उसके तरल हृदयमें भगवान दिखता है और तब उसका सम्बन्ध संसारसे टूट जाता है और वह शुद्ध परा भक्ति

Friday, 17 May 2013

यह खेल रौशनी का........





                           आप ने किस्से कहानिया तो जरुर सुनी होंगी जिसमे बुराई पर अछाई की जीत होती हैं जहाँ अंधकार, बुराई का और दुःख का प्रतीक हैं वहीँ अछाई, रौशनी का और आस्था का प्रतीक हैं | आप को कैसा लगेगा जब आप एक ऐसी जहग पहुँच जाये जहाँ पर अँधेरा ही ना हो चाहे दिन हो या फिर रात और हर तरफ ढेरो आदमियों का काफिला आस्था में डूबा हुआ ही दिखाई दें | हर तरफ रौशनी ही रौशनी हो जहाँ रेत पर एक सुई भी खोजने में खासा दिक्कत ना हो | जहाँ दिन में सूर्य की रौशनी प्रकाश की ज्योत जलाती हैं वहीँ रात में बिजली विभाग की तरफ से लगाये गए बिजली के खम्भे | लोगो का मानना है की ऐसी जगह केवल सपनो में हो सकती है या फिर ध्रुवीय प्रदेशो में जहाँ वर्ष के छ: महीने तक सूर्य निकला रहता हैं, जी नहीं ! इलाहाबाद नगरी को भी यह मौका मिलता हैं जब कुम्भ मेला लगता हैं | इस बार इलाहाबाद में लगे कुम्भ मेले में बिजली विभाग ने सबसे उम्दा काम किया था | विभाग ने ११ करोड़ रुपये खर्च करके मेले में आये सभी लोंगो को रौशनी प्रदान कर उनके आस्था को और भी मजबूत कर दिया | जिसकी वजह से दिन हो या फिर रात लोग अपना काम बिना रुके कर रहे थें | रौशनी की ही वजह से आखाड़ो में पूजन करने वाले साधू सन्यासियों को किसी भी प्रकार की दुविधा उत्पन्न नहीं हुयी | महाकुम्भ मेले में लगे हुए बीस हज़ार खम्भे पुरे के पुरे मेला क्षेत्र को एक अविस्मरनीय रोशिनी से जगमगा रहे थें, जिसे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो जैसे स्वयं देवलोक ज़मी पे उतर आया हो और अभी माँ गंगा, जमुना और सरस्वती तीनो उठ खड़ी होंगी अपने बच्चों को आशीर्वाद देने के लिए | यही वो रौशनी थी जो आस्था की हर एक किरण को खुद में पिरोकर लोंगो तक पहुंचा रहीं थीं | जिस किसी की भी नज़र इस रौशनी की तरफ गई वो मनो थम सा गया हो और उसकी निगाहे बस यहीं कह रहीं हो की बस आज देख लेने दो.......... जी भर के | क्या पता कल ऐसी रौशनी का अलोकिक नज़ारा देखने को मिले या न मिले |  कुम्भ मेले में फैली चारो ओर रौशनी की जगमगाहट ने सभी को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया | हर कोई इस जगमगाहट भरी रौशनी में खुद की परछाई को देखने की इच्छा लिए चला आ रहा था..........बस चला आ रहा था |  इस जगमगाहट की रौशनी इतनी थी की नासा के वैज्ञानिक भी खुद को रोक नहीं पाए और मोड़ दिया सैटैलाइट को इलाहाबाद की ओर | जिसने भी इस रौशनी को देखा वो इस रौशनी का कायल हो गया |

ध्वजा पूजन



 



              “ध्वज” किसी भी समूह या समुदाय का प्रतीक होता है | इसके साथ ही मान्यता हैं की ध्वजा में भगवान् बजरंगबली का वास होता हैं जो की उस उद्देश्य की पूर्ति करते हैं जिसके लिए उस ध्वज को रोहित किया गया हैं | इसी लिए तो महाभारत के युद्ध में भी अर्जुन के रथ पर ध्वज को लगाया गया था जिसकी वजह से उन्हें अपने उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफलता हासिल हुई |

जब पेशवाई के बाद कोई भी आखाडा संगम नगरी में प्रवेश करता हैं तो प्रवेश के दुसरे ही दिन अपने और अपने सभी भक्तों की मनोकामना की पूर्ति हेतु ध्वजा रोहन किया जाता हैं | इस ध्वजा रोहन की शुरुवात भूमि पूजन के साथ ही शुरू होता हैं |  भमि पूजन का मुख्य उद्देश्य, उस भूमि का शुक्रिया करना जिस भूमि पे रहकर इस आस्था के कार्य को संपूर्ण करना हैं | इसके बाद शुरू होता हैं मंत्रोचारण का अदभूद नजारा, जिसमे कई सारे साधू संत एक साथ मन्त्रों का उच्चारण करते हैं और पुरे वातावरण को अपने मंत्रोचारण से गुजायामन कर देते हैं | करीब एक घंटे तक चले इस पूजन के पश्चात् सभी साधू संत ध्वज की लकड़ी को लाकर जमींन से ऊपर उठाकर हाथों या मेजों पे लिटा कर रख देतें हैं | फिर इसके बाद शुरू होता हैं लकड़ी पूजन जिसमे ध्वज की लकड़ी को पंचामृत से सभी लोंगो द्वारा स्नान कराया जाता हैं | फिर इसके ऊपर एक लाल रंग के कपडे को लपेटा जाता हैं और लकड़ी के सिरे पर ध्वज को लगाकर उसके ऊपर मयूर पंख को शोभित किया जाता हैं जो की देखने में अत्यंत शोब्नीय लगता हैं | फिर इसके बाद सभी लोग एक समन्वय में कार्य करते हुए ध्वज को आकाश की ओर ऊठाते हैं | जब ध्वज पूरी तरह से ऊठ जाता हैं तो फिर इसके बाद सभी आखाड़े के साधू संत एक जुट होकर अपने गुरु की पूजा करते हैं जिनकी मूर्ति को आखाड़े में विराजित किया गया हैं | इस पूजा में सभी तरफ ढोल मंजीरे की आवाज साथ ही मन्त्रों के उच्चारण आपको एक पल के किये उस खुदा से आपको जोड़ देते हैं जिसने इस संसार को बनाया हैं | इसके बाद सभी भक्तों में प्रसाद का वितरण किया जाता हैं | और सच में वो प्रसाद, प्रसाद नहीं अमृत होता हैं जिसे खाकर आत्मा तृप्त हो जाती हैं | भक्तों में प्रसाद वितरण के साथ ही ध्वजा पूजन संपन्न होता हैं और फिर शुरू हो जाती हैं आस्था के संगम में दुबकी लगाने की होड़ ........................|

 

एक शहर आस्था का


 


                 “आस्था” कहने के लिए कितना छोटा सा शब्द , लेकिन इसी एक छोटे से शब्द में पूरा का पूरा संसार छुपा हुआ हैं | इस छोटे से शब्द में इतनी शक्ति है जो किसी भी इन्सान के सभी कष्टों को मिटा देता हैं इसकी ताकत से सभी इसके द्वार पर खिचे चले आते हैं | इस शब्द में इतनी शक्ति हैं की रातों रात एक अलग शहर संगम नगरी में बसा देता हैं | शायद इतनी शक्ति हमारे सुपर कंप्यूटर में भी न हो क्योकि उसमे भी हमें कुछ करने के लिए अपना देमाग लगाना पड़ता है लेकिन इसमें तो सब बस अपने मन से ही खिचे चले आते हैं | इस आस्था के शहर में सब अपने आपको उस सर्वशक्तिमान के हवाले कर देते हैं की अब बस वो ही उनकी जिंदगी का फैसला करे और उन्हें सही रास्तें दिखाए |  इस आस्था के शहर में सभी एक बराबर होतें हैं ना कोई छोटा और ना ही कोई बड़ा | और सबसे बड़ी बात की इस आस्था के शहर में कोई भी भूखा नहीं सोता भले ही वो गरीब हो, उसके पास पैसे ना हों लेकिन उसे दोनों समय खाना जरुर मिलेगा | उन गरीबों के लिए रहने, सोने और साथ ही साथ मेडिकल की भी व्यवस्था बिना कोई भी पैसा लिए की जाती हैं | इस आस्था शब्द में इतनी ताकत है की यह कई लोंगो को अपना पेट पलने के लिए इस शहर में रोजगार भी उपलब्ध करता हैं | इस शब्द की बात ही निराली हैं पहले जहाँ रेत ही रेत थी वंहा एक ऐसी नगरी बसा दी जिसे देखकर लोग दांतों तले अपनी उंगलिया दबा ले | एक ऐसी नगरी जिसकी रौशनी को अंतरिछ से भी देखा जा सके, जहाँ कभी भी लाइट नहीं कटती, जहाँ चोरी नहीं होंती, जहाँ सभी भक्ति भावना में लिप्त होकर प्रभु को याद करते रहतें हैं, जहाँ चारों तरफ एक ऐसी शांति जो आपको सुख प्रदान करें | ऐसे शहर की कल्पना भी कर पाना मुश्किल हैं लेकिन “आस्था” जैसे एक शब्द ने ऐसा करिश्मा कर दिखाया हैं जो की अदभुद और हैरतंगेज हैं |

Wednesday, 24 April 2013

आखाड़ो की पेशवाई



                               

आखाडा............! अलग अलग छेत्रो के लोग,अलग भाषा और अलग वण लेकिन सभी के मन का भाव आस्था की ओर | इन सभी लोंगो के एक स्थान पे एकत्र होकर अपने धर्मं गुरु की शरण में रहकर कल्पवास करना और श्राद्धा भाव से भजन पूजन करना ही इनका मुख्य उद्देश्य है और मन की आस्था भीं | यही वजह है की ये सभी मिलकर एक आखाड़े का निर्माण करते है |  जब कुम्भ मेला लगता है तो सभी अपने आखाड़े में एकत्र हो जाते हैं और फिर शुरू होती हैं पेशवाई की आगाज, जो इनके स्थानीय आखाडा भवन से शुरू होकर कुम्भ मेले की रेत पर ही ख़त्म होती हैं | पेशवाई का मुख्य उद्देश है की यह आखाडा अपने सभी साधू संतो को लेकर संगम की नगरी में पहुँच रहा हैं जहाँ पर रहकर यह लोंगो के मन में भक्ति भावना का प्रचार प्रसार करेंगे | इस पेशवाई को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं | भारतीयों के अलावा विदेशों से भी लोग आकर इन साधू संतो की पेशवाई को देखते हैं | जब किसी भी आखाड़े की पेशवाई शहर की सड़कों से होते हुए गुजरती हैं तो लोग अपने-अपने घरों की छतों पे खड़े होकर साधू संतों के ऊपर फूलों की बारिश करते हैं और हर हर महादेव, जय हो गंगा मैया के उद्घोष से पुरे वातावरण को गुंजायमान करते रहते हैं | इसी के साथ ही सभी अपनी अपनी इच्छा अनुसार साधू संतो को रास्ते भर जल पान वितरित करते रहते हैं ताकि उन्हें भी इस शुभ कार्य में थोड़ी सी हिस्सेदारी मिल सकें |
                         इस पेशवाई में हजारो लोगो का हुजूम उमडा होता है जिनमे सबसे आगे पुलिस बल अपने घोड़ो के साथ चलते हैं फिर उनके पीछे हाथों में चांदी की छड़ी लिए हुए कुछ साधू चलते हैं इन साधुओ को आखाड़ो का कोतवाल कहा जाता हैं | ये कोतवाल ही हैं जो आखाड़ो की निगरानी करते हैं और पेशवाई के दौरान पेशवाई को सुचारू रूप से पुण‌‍‌॔ करवाते हैं | इनके पीछे अलग अलग झाकियां चलती रहती हैं जिनमे विभिन्न लीलाओ का मंचन होता रहता हैं | जिनमे प्रभु श्री कृष्णा की गोपियों के साथ नृत्य, श्री राम का चरित्रा और बाल हनुमान की लीलाओ का मंचन किया जाता हैं | इन झाँकियो के पीछे आखाड़े की गुरु जिनकी पूजा की जाती हैं उनकी सोने की मूर्ति एक रथ पे सवार होकर चलती रहती हैं और साथ ही आखाडा ध्वज भी एक अलग रथ पे विराजमान रहता हैं | यह आखाडा ध्वज उनके आखाड़े की निशानी होती है जिसपे उस आखाड़े का अपना कोई निशान बना होता हैं | यही निशान उनके आखाड़े को मेला छेत्रा में चिन्हित कराता हैं | फिर इनके पीछे उस आखाड़े के चारो महंतो का जत्था अपने अपने रथ पर चलता हैं | ये चारो महंत एक – एक दिशा से होता हैं अर्थात हर एक दिशा का एक महंत होता हैं, ताकि इनके आखाड़े की ख्याति चारो दिशाओ तक पहुँच सके | और फिर अंत में उनके पीछे उस आखाड़े के सभी छोटे बड़े साधू संत चलते रहते हैं | किसी किसी आखाड़े की पेशवाई इतनी लम्बी होती हैं की एक बार पेशवाई के शुरू से अंत में पहुँच जाने के बाद वापस शुरू में पहुँच पाना काफी मुश्किल होता हैं |
                     जब पेशवाई कुम्भ मेले में पहुँच जाती हैं तो मेले के बहरी छोर पर मेला प्रशासन अधिकारी उस आखाड़े के सभी महंतो को माला फूल पहना कर उनका स्वागत करता हैं और उन्हें मेला में निर्धारित उनके स्थान पे आदर के साथ पहुंचता हैं | इसके बाद मेला में बने उस आखाड़े के द्वार पर कोई एक साधू सरसों के तेल को द्वार के दोनों तरफ गिरता है और फिर वह पेशवाई उस मेला में बने आखाड़े में प्रवेश करती हैं | सरसों के तेल को गिराने के पीछे यह धारणा हैं की आप जिस शुभ कार्य को करने जा रहे हैं उसे किसी की भी नजर नहीं लगेगी | इसके बाद जब पेशवाई अंदर आ जाती हैं तब सबसे पहले रथ पे सवार आखाड़े के गुरुओ की मूर्ति को वहां बने पवित्र स्थान पे रख दिया जाता हैं और फिर शुरू होता हैं आरती का सिलसिला जो पुरे मोहोल को और भी भक्तिमय बना देता हैं | अंत में सभी को प्रशाद भेट कर पेशवाई सम्पूर्ण कराने की बधाई दी जाती हैं |

Sunday, 10 March 2013

काश ये धरती ख़त्म हो जाती


                      


                   माया कैलेंडर के मुताबिक ये धरती वर्ष २०१२ दिसम्बर को ख़त्म हो जाएगी| जब यह खबर मेरे कानो तक पड़ी तो मेरे पैरो के निचे से मानो जमींन ही खिसक हो, मुझे ऐसा लगा की ये भी कोई समय है धरती के ख़त्म होने का मैंने तो अभी ठीक तरह से दुनिया भी नहीं देखा और दुनिया के ख़त्म होने की बात भी आ गई| कितने सपने संजोये थे, मैंने क्या सब बस यु ही बेकार हो जायेंगे| मुझे इसी बात का गम था लेकिन जब उस लड़की के साथ हुए दरिंदगी भरे सलूक के बारे में सुना तो बस सर शर्म से निचे झुक गया इतना की उठने में कई साल लगेंगे| इस खबर को सुनकर तो उस कानून के पुतले को भी शर्म आ गयी होगी और कहा होगा की आच्छा हुआ जो मैंने अपने आँखों पे पट्टी बांध रखी है वरना मै ये सब बर्दाश नहीं कर पाती|
                    आखिर वो नादानं कितनी बेवकूफ थी जो हरदम यह सोचा करती थी की वो आजाद देश में रहती है जहाँ का संविधान लड़कों और लडकियों दोनों को बराबर नज़रिए से देखता है, जहाँ वह भी आम लडको की ही तरह कहीं भी आ जा सकती है, अपने पुरुष मित्र के साथ कहीं भी घूम सकती है और रात के १०:०० बजे भी अगर बाहर रहे तो कोई भी कुछ भी कहने वाला नहीं है| आखिर उसे भी क्या पता था की जिस शहर में बड़े से बड़े कानूनों को बनाया जाता है, जहाँ महिलाएं कानून और संविधान की नुमाइंदो के तौर पर तैनात होकर देश की सुरक्षा को अपने हाथ में लिए हुए हैं, उसी जगह पे उसके साथ ऐसी शर्मनाक वारदाते हों सकती हैं |
                       दिल्ली की सडको पर दौड़ती बस के अंदर जो दरिंदगी हुई वो न सिर्फ एक शर्मनाक हरकत थी बल्कि कानून के साथ साथ आम इंसानों की रूह को भी झ्ग्झोर देने वाली घटना थी जिसकी वजह से हर एक हिन्दुस्तानी क्या पुरे देश में रहने वाले सभी इन्शानो को शर्म से गर्दन कटा देने का मन कर किया होगा | आखिर कैसे कुछ चंद लफंगों ने पुरे के पुरे देश की कानून व्यवस्था को हिला के रख दिया| हम पुरे साल भर बस यही गातें रहें की “हमारा देश तरकी कर रहा है”, “हम लोग सभ्य लोग हैं”, “we are the social animal  लेकिन साल के ख़त्म होते होते हमारे सारे दावें धराशाही हो गए और हमारे साथ साथ पूरी दुनिया के सभी लोग यह जान गए होंगे की हम कितने सभ्य हैं, जहाँ लडकियों को लडको के बराबर होने का दावा किया जाता है वही कुछ लोग एक लड़की को बस में डालकर सरेराह उसकी इज्जत लुटते हैं और उसे मारने के बाद सड़क पे फेंक देंते हैं| क्या उन्हें पुलिस का या फिर हमारे कानून का जरा सा भी डर नहीं हैं और......................| और तो और नेताओ की टिपण्णी तो देखिये जब वो लड़की मर जाती हैं तो कुछ लोग उस घटना के विरोध में प्रदर्शन कर रही लडकियों को कहते हैं की “लिपस्टिक लगा कर डिस्को जाने वाली ये लडकिया यहाँ जमा हुई हैं” तो कुछ लोग ट्विटर पे लिखते हैं की “उस लड़की का नाम क्यों नहीं बताया जा रहा हैं?” पता नहीं इन्हें उसका नाम जानने में इतनी दिलचस्पी क्यों हैं|
                    सभी लोग इधर उधर की बाते कर रहे है लेकिन किसी ने भी उसके घर वालो के बारे में नहीं सोचा होगा की आखिर वो कैसे आपने आप को संभल रहे होंगे, कैसे जी रहे होंगे शायद वो भी यही चाह रहे होंगे की काश ये धरती ख़त्म हो जाती तो उन्हें ऐसी शर्मनाक हकीकत का सामना नहीं करना पड़ता|  


Sunday, 21 October 2012

सच और पर्दा




                           पर्दा .........| एक ऐसा लिबास जो लोगो कि बुराइया, लोगो कि इज्ज़त और लोगो के शर्म को छुपाने के काम आता है | पहले लोग घरो में परदे लगा कर घर कि इज्ज़त घर में रखते थे और साथ ही साथ शर्म और हया को भी लेकिन अब तो ट्रेंड चल पड़ा है चहरे पे पर्दा लगाने का, शायद इसी लिए कवियों ने चहरे से परदे हटाने को अपने गानों में भी लिख दिया है | आज जहा देखो वही लोग चहरे पे पर्दा लगाये घूम रह है, ना जाने क्या मज़ा आता होगा चहरे को परदे से ढक कर | अब तो सड़क पे चलती लडकिया भी चहरे पे पर्दा लगा कर ऐसे चलती है जैसे मानो कि शहर नकाबपोशो से भर गया हैं | ये पर्दा तो कुछ भी नहीं, सच के ऊपर पड़ने वाले परदे से |  आज हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहाँ लोग सच के उप्पर पर्दा डालकर रहना ही पसंद करते हैं क्योकि लोगो के अंदर हिम्मत नहीं है “सच का सामना करने कि”, ना जाने कब तक ये दुनिया यू ही सच के बगैर चलेगी | हमारे समाज में पर्दा यंहा तक हैं कि जिस देवी कि हम सब पूजा करते हैं उनके भी चहरे को परदे से ढक के रखा जा रहा हैं| मैं पूछता हू आखिर क्यों? वो हम सबकी माँ हैं, हम सब उनको भक्ति भाव से पूजते हैं, तो फिर ऐसा भेद भाव क्यों? आखिर.........क्यों ?
                  अभी कल ही मैं बाज़ार से लौट रह था तो मैंने कुछ लोंगो को देवी माँ कि प्रतिमा को रिक्शे से ले जाते देखा लेकिन ये क्या लोगो ने उनका मुहँ परदे से ढक रखा था | ऐसा क्यों मैं बस उन लोंगो से यही पूछना चाहूँगा कि वो तो एक प्रतिमा थी लेकिन अगर उस प्रतिमा कि जगह सच मुच में देवी माँ होती या फिर मेरी माँ और आपकी माँ होती तो क्या आप लोग तब भी इसी तरह से उनका मुहँ ढक कर ले जाते यंहा से वहां| नहीं ना तो फिर उस प्रतिमा के साथ जाने अनजाने में ऐसा पर्दा क्यों? कँही ये पर्दा हमारे समाज के लोगों कि सोच और उनके सच पे भी तो नहीं पर्दा डाल रहा |

                  
                                 

Thursday, 18 October 2012

ये जीना भी कोई जीना हैं


                              


                                      मैं इलाहाबाद के रेलवे स्टेशन पे खड़ा हूँ और टिकट लेने कि जुगत में लगा हूँ लेकिन यहाँ क्या देखता हूँ कि एक बन्दा आता है और बाहर घूमते हुए एक क्लार्क के पास जाकर उसे कुछ रूपए देता है और कुछ ही देर बाद उसे तुरनत टिकट भी मिल जाता है, न ही उसे लाइन में खड़े रहने कि जरुरत पड़ती है और न ही इंतजार करने कि बस आओ टिकट के दाम से दस रूपए ज्यादा दे दो बस थोड़ी ही देर में टिकट तुम्हारे हाथो में, शायद इलाहाबाद में इसी तरह टिकट लिया जाता है |  
                              यहाँ लोगो को जीने कि चाह तो है लेकिन दुसरो को निचा दिखा कर और कुछ तो ऐसे है जो कला से भी जीते है इंसान तो ठीक है किसी भी कला कि लिए लेकिन यहाँ के लोगो ने तो जानवरों को भी कलाकार बना डाला है| इसका अहसास मुझे तब हुआ और साथ ही साथ झटका भी लगा जब स्टेशन पर एक औरत को देखा जो एक गाय को ले कर बैठी हुई थी जिसके सामने कुछ घास रखी हुई थी लेकिन पता नहीं क्यों वो गाय घास को खा नहि रही थी | मुझे लगा कि शायद उसे अभी भूख नहीं होगी लेकिन कुछ ही देर में मेरा ये भरम ही चकना चूर हो गया, जब मैंने एक आदमी को घास खरीदते हुए देखा और उसी गाय को खिलाते हुए भी | फिर मुझे सारा माजरा समझ में आया कि वो औरत वहा पे बैठकर लोगो को पुण्य बेचती है, ५ रुपये का पुण्य, १० रुपये का पुण्य और २० रुपये का पुण्य | ये एक ऐसा पेशा है जिसमे सभी खुश हो जाते है घास खरीदने वाला भी, बेचने वाला भी और खाने वाला भी | वैसे अब गाय भी प्रोफेसनल हो गयी है वो जानती है कि सामने रखे हुए घास को नहि खाना है जब तक कोई खरीद के न खिलाये |
                        यहाँ के बारे में और क्या कहू आप सभी जानते है कि यहाँ पे कमरों कि कितनी किल्लत है | एक छोटा सा भी रूम जिसमे दो लोगो के ठीक से खड़े होने कि भी जगह नहीं है उसका भी किराया १५०० रुपये है | यहाँ पे आकर सबसे बड़ा झटका यही लगा, मैंने देखा कि एक मकान के चार कमरों में १० लड़के किराये पे रहते है और मकान ऐसा जिसमे न ही हवा आती है और ना ही साफ सफाई रहती है| जब पता किया कि उस मकान का मालिक कौन है तो पता चला कि उस मकान का मालिक खुद एक मलिन बस्ती में झुग्गी में रहता है और स्टेशन पे बैठ कर बिख़ मांगता है और जब महीने का आखरी सप्ताह आता है तो किरायदारो से पैसे वसूलने पहुच जाता है | ऐसा जीना भी क्या जीना जिसमे खुद को ख़ुशी न पहुचे और दिल को सुकून न पहुचे | सुच में
                        ये जीना भी कोई जीना है ! 
                 

             

Sunday, 30 September 2012

बनारस के घाट पर


कुछ था जरुर बनारस के घाट पर,
धुंधला दिखा लिबास बनारस के घाट पर|
 
घर था हज़ार कोस मगर फिकर साथ थी,
मन हो गया उदास बनारस के घाट पर|
 
साँझा करिया की संधि में विचलित हुआ ये मन,
गढ़ने लगा समय बनारस के घाट पर|
 
दुनिया के रंग देख कर हर रोज कबीर,
करता है अथाहस बनारस के घाट पर|
 
बदरंग हुआ जल तमाम मछलिय मरी,
किसका हुआ निवास बनारस के घाट पर|
 
फिर औ भागीरथ नयी सी गंगा बुलाओ,
गता है रविदास बनारस के घाट पर|
 
जमने लगी है आरती उत्सव भी हो रहे,
फिर से जगी है आस बनारस के घाट पर|
 
कशी को बम का खौफ आमा भूल जाइये,
मत बोइये खटास बनारस के घाट पर|
 
दीना की चाट खूब तो अख्टर की मल्लियो,
रिश्तो में है मिठास बनारस के घाट पर|
 

 

Monday, 10 September 2012

जिंदगी एक क़र्ज़ सी


                        जिंदगी एक क़र्ज़ सी
                                                                             आख़िरकार कई दिनों के बाद जिंदगी एक क़र्ज़ सी लगने लगी हैं| कहीं न कहीं कुछ तो है जो यह सोचने पर मजबूर कर देता हैं की यें जिंदगी आपकी नहीं हैं बल्कि उधर ली हुई हैं और उसका कर्ज हमें हर कदम, हर समय पे चुकाना पड़ता हैं| यह अहसास आज सुबह ही मुझें हुआ, जब मैं घर से निकल रहा था| तभी पीछे से आवाज आई “शाम को आते समय सब्जियां लेते आना”, लेकिन मैं आवाज को अनसुना करता हुआ अपनी ही मस्ती में आगे बढ़ने लगा| कुछ दूर आगे बढा ही था की एक बच्चा हाथ में कटोरा लिए हुए, फंटे-पुराने कपडे पहने और आँखों में मासूमियत के छोटे-छोटे तारे बनाये हुए कुछ पाने की चाह में मेरे सामने आ खड़ा हुआ| उसे देखते ही मेरे हाथ बिना मेरी इज्जाजत लिए जेब की तरफ बढ़ उठे, कुछ टटोलने के बाद बहार निकले और मेरे मुहँ से निकल पड़ा “छुट्टे नहीं हैं”| मैं आगे बढ़ चला और तब तक पीछे मुड़कर नहीं देखा जब तक मुझे विश्वास नहीं हो गया की अब मैं उस बच्चे की आँखों से ओझल हो चूका हूँ|
                                                                   दिनभर के सारे कामो को निपटने के बाद शाम को जब सब्जी लेकर घर पंहुचा तब तक मेरे सारे पैसे खत्म हों चुके थें| तब मैंने माँ से ही पैसे मांगना उचित समझा और उसी छोटे बच्चे की तरह आँखों में मासूमियत के तारे टिमटिमाते हुए माँ के सामने खड़ा हो गया| अब बस मेरे और उस बच्चे के बीच एक ही चीज का फर्क था “कपड़ों का”| वह फटें-पुराने कपड़ों में अपना काम कर रहा था और मैं अच्छे कपडें पहनकर वह काम कर रहा था| जैसें ही मैंने माँ से कहा, माँ ने वहीँ शब्द दोहराते हुए मुझसे कहा जो मैंने उस बच्चे से कहा था और मैं उसी बच्चे की तरह खड़ा होकर माँ को देखने लगा, जब तक की वो मेरी आँखों से ओझल होकर दूसरे कमरे में ना चली गयी और छोड़ गई मेरे ज़ह्हन में एक आवाज़
कर्ज!!!!!!!!!!!
आखिरकार पैसा हमने तो बनाया नहीं हैं वो तो सबके लिए हैं बस किसी के पास कम है और किसी के पास ज्यादा, जिसके पास ज्यादा हैं उसको जरुरत नहीं और जिसके पास कम हैं उसके पास हैं नहीं||