ये सूरत
बदलनी चाहिए
‘भाग भाग डी के बोस.......’ यह वाक्य
आज न चाहते हुए भी हमारे कानो में पढ़ जाता है, एक गाने के रूप में| क्योकि आज लोग
‘दम मारो दम’ और ‘देसी बॉय’ को ज्यादा पसंद करते
है|
पहले के समय का नायक सभ्य और शरीफ होता था,
लेकिन अब उनका क्या करे जिन्होंने MkWu को ही अपना नायक
बना लिया है|
ऐसे अभद्र गाने इस देश
में पैर पसर चुके है, की हर कोई इसका शिकार भी है और शिकारी भी| इसकी जड़े इतनी
गहरे तक फ़ैल चुकी है है की बच्चो के सोचने की बुनियाद कमजोर होती नजर आ रही है| एक
सदी पहले शुरू किया गया सिनेमा का कार्य, लोगो तक अपनी बाते पहुचना था, लेकिन लोगो
ने कुछ नया देखने के चाक्कर में सिनेमा को ऐसे मोड पे लाकर खड़ा कर दिया है जहा अब
लोग अपने परिवार के साथ बैठकर सिनेमा देखने से कतराते है| अब तो आलम यह है की बस
युवा पीढ़ी ही केवल सिनेमा की तरफ रुझान किये है और वयस्कों ने तो उस ओर से अपना
धयान ही हटा लिया है क्यूकी वो जानते है की पहले ‘मेरा नाम जोकर’, ‘मदर इण्डिया’
जैसी फिल्मे बनती थी जो दिल को छु लेती थी लेकिन अब सिनेमा के १०० साल पुरे होने
के बाद यह पूरी तरह से बदल चूका है| इस समय की फिल्मे ‘मर्डर’, ‘जिस्म’, ‘दिर्टी
पिक्चर’ जैसी फिल्मे आ गई है, जो काफी अभद्रता प्रदर्शित करती है| अब तो लोगो ने
फिल्मो की ऐसी सूरत बना रखी है जैसे किसी व्यक्ति ने चाय के प्याले को अपने सफ़ेद
कमीज पे गिरा दिया हो, आखिर फिल्मो की ऐसी सूरत बनाने में भी तो इंसानों का ही हाथ
है| शायद फिल्मो की ऐसी सूरत बनाने वालो ने यह नहीं सोचा था की आखिर उनके आने वाले
बच्चो के भविष्य पे ये कैसा प्रभाव डालेगी| उन बच्चो के भविष्य को सुधरने की
जिम्मेदारी हमें उठानी चाहिए और फिल्मो की “ये सूरत बदलनी चाहिए”
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